जीवन-प्रेरणा
मैं विद्यालय से वापस लौटा ही था। पहले से ही मूड़ खराब था, रास्ते में एक घटना और घट गई( जिसने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। मैं चिन्तित हो उठा, `यह क्या होता जा रहा है, नैतिकता का पतन और कहा¡ तक होगा? आजकल के युवा दूसरों का सम्मान करना तो जानते ही नहीं, अपने मा¡-बाप व िशक्षकों तक का भी नहीं, और तो और लड़किया¡ भी इस कदर बेशर्म हो जायेंगी, आज से पचास वषZ पूर्व कोई सोच भी सकता था क्या?´ मैं इसी चिन्तन में था कि मेरा मित्र भविष्यवक्ता उपदेशक आ टपका। आते ही चाय-नाश्ते के लिए ऑर्डर दिया, गोया मेरे घर में नहीं किसी होटल में पधारा हो। मेरी और एक मुस्कान फेंकी और तुरन्त ही मेरी दयनीय स्थिति को समझते हुए बोला, `` अरे! आज फिर आपके सड़े-गले सिद्धान्तों और चौंदहवी सदी की नैतिकता का खून हो गया और आप उसका मातम मना रहे हैं? ´´ वह खिलखिलाकर ह¡सता रहा। जब मुझे अधिक गम्भीर देखा तो समझाने के अन्दाज में बोला, `` हम इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ में जी रहे हैं। क