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30 अप्रैल, 2008


ब्लॉग्स (1)
यहाँ वही है हंसता दिखता स्वार्थ ही हमको नित्य रुलाता, स्वार्थ ही नित तड़फाता है।यहाँ वही है हंसता दिखता, नित रोकर जो गाता है।।तू काँटों को फूल समझ ले,आग को ही तू कूल समझ लेभूल हुई जो सुधर न सकती,खुशियाँ अपनी धूल समझ ले।जो भी बनता साथी ... आगे पढ़ें...