खड़े-खड़े
श्री बैकुंठ नाथ, अहमदाबाद
आधार है
भारतीय संस्कृति का
शान्ति!
बैठकर शान्ति से
पूजा, अर्चना, वन्दना, गीत-संगीत
खाना-पीना, लिखना-पढ़ना
नहाना-धोना, शादी-विवाह
सारे संस्कार बैठकर
शान्ति से होते हैं सम्पन्न
किन्तु आज
सीख गये हम
खड़ा होना- खड़े होकर जीना
हम खड़े-खड़े
घर के कोने में या ताक पर रखे
भगवान की करते हैं पूजा
सीख गये हम
खाना-पीना, लिखना-पढ़ना
नहाना-धोना खड़े-खड़े
चलते-फिरते बतियाने से
अब होटलों में भी
खाने की मेज नहीं
खड़े होने की मेज है
चाय और मदिरा
खड़े-खड़े
रोमांस-खड़े खड़े
श्रृंगार खड़े-खड़े
या फिर चलते-फिरते
बैठते भी हैं मगर-
कुर्सी पर, स्टूल पर
धरती की छुअन से दूर
जल्दी में, भागते से,
दौड़ते से-
मिन्दर में कर लेते हैं दर्शन
खड़े- खड़े
काश हम
फिर से
बैठना सीख जाते
धरती की छुअन को
महसूस लगते करने
युद्ध की इस दौड़ में
शान्ति से बैठ पाते
बैठना सीख पाते।।
शबनम ज्योति 2008 से साभार

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