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सुरसा के मुहँ की तरह बढ़ते वेतन व भत्ते


सुरसा के मुहँ की तरह बढ़ते वेतन व भत्ते


छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट आ गई है। पहले दिन तो लोगों की प्रतिक्रिया ठीक-ठाक ही थीं, किन्तु जैसे-जैसे उनका अर्थ समझा गया आपस में विचार-विमर्श हुआ, रिपोर्ट का विरोध किया जाने लगा। कर्मचारी-गण वेतन आयोग की रिपोर्ट से सन्तुष्ट नहीं हैं। उन्हें और अधिक चाहिए। आंकडे प्रस्तुत किये जा रहे हैं कि वेतन आयोग की रिपोर्ट में लगभग 40 प्रतिशत वृद्धि की सिफारिशें की गईं हैं किन्तु यह चालीस प्रतिशत की सिफारिशें कर्मचारियों को मान्य नहीं, कर्मचारियों की मांग को देखते हुए वेतन आयोग की रिपोर्ट का अध्ययन कर सुझाव देने के लिए एक और समिति का गठन कर दिया गया है, जो निश्चित रूप से और अधिक फायदा देने के लिए ही सिफारिशें प्रस्तुत करेगी। चुनावी वर्ष है। सरकार को सिफारिशें मान भी लेनी हैं क्योंकि वह कर्मचारियों के इतने बड़े तबके को नाराज करना नहीं चाहेगी। असंगठित किसान व मजदूरों पर संगठित कर्मचारी प्राथमिकता पा ही जाते हैं। दूसरी बात विधायिका व न्यायपालिका अपने वेतन-भत्तों को स्वयमेव जब इच्छा होती है, बढ़ा ही लेती हैं। ऐसी स्थिति में नौकरशाही को खुश रखना भी उनकी मजबूरी है। अन्तत: काम तो इनसे ही लेना है। जनसेवक के रूप में दिखाकर अपने स्वार्थों की पूर्ति तो इन्हीं से होनी है। अत: सरकार यह भी अपना पावन कर्तव्य समझती है कि वह अपने कर्मचारियों को पूर्ण रूप से सन्तुष्ट रखे। अत: होता यही है कि सरकार कर्मचारियों के हितों की सिफारिशों को तो मान लेती है किन्तु उन पर नियन्त्रण लगाने की सिफारिशों को नहीं मानतीं। छुट्टी कम करने व काम में सुधार करने की सिफारिशों को नजरअन्दाज कर दिये जाने की संभावना अधिक है।अब एक नजर पांचवे वेतन आयोग से पूर्व के वेतन पर डाली जाय। यहा पर सभी वेतनमानों का उल्लेख करना आवश्यक नहीं है और न ही व्यावहारिक। हम याद करें 1400 व 1600 से प्रारंभ होने वाले वेतनमानों को क्रमश: 5500 व 6500 के वेतनमान दिये गये थे। जो लगभग चार गुना वृद्धि थी। वर्तमान छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू होने पर इन्हें क्रमश: 13770 व 15510 रुपये 1 जनवरी 2006 से मिलेगा जो वर्तमान स्थिति में 20000 से कुछ ही कम भले रहे। वेतन में ये वृद्धि अभी हो रही हो, ऐसी बात नहीं है। सेवा अवधि के अनुसार वार्षिक वृद्धि का प्रावधान भी होता है। मह¡गाई की दर को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक छ: माह में मह¡गाई भत्ता घोषित किया जाता है। इस प्रकार छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट को लागू होने से पूर्व भी वषZ में तीन बार कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि होती रही है। एक बार वार्षिक वेतन वृद्धि के समय तथा दो बार मह¡गाई भत्ता घोषित होने के साथ 1 जनवरी व 1 जुलाई से। कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि किस कदर होती है, इसे एक उदाहरण से समझना काफी होगा। मैं एक विद्यालय में छोटा सा अध्यापक हू¡। मैंने नवम्बर 2001 में सेवा में प्रवेश किया था। प्रवेश के समय से मेरा वेतनमान 6500-200-10500 है। इस वेतनमान के अन्तर्गत मुझे प्रारंभ में दिसम्बर 2001 में 9425 रुपये मिले थे, जो दिसम्बर 2007 में 16286 रुपये हो गये थे। इस प्रकार छ: वषZ के अन्दर ही मेरे वेतन में 6861 की वृद्धि हुई। एक छोटे से अध्यापक के वेतन में वृद्धि का यह हाल है तो बड़े-बड़े अधिकारियों के वेतन में वृद्धि का अनुमान लगाया ही जा सकता है। यह स्थिति छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने से पूर्व की हैं। सिफारिशें लागू होने के बाद की स्थिति तो और भी आश्चर्यजनक होगी।कर्मचारियों में भी छोटे कर्मचारियों को झेलना ही पड़ता है। छठे वेतन आयोग की सिफारिशों में भी वेतन में 1 : 12 का अन्तर दिखाया गया है। अब कहा¡ एक रुपया और कहा¡ 12 रुपये। एक रुपये पाने वाला भी सरकारी कर्मचारी और 12 रुपये पाने वाला भी सरकारी कर्मचारी। 1 जनवरी 2006 को वेतन निर्धारण के समय एक कर्मचारी को 5740 रुपये पगार मिलेगी तो दूसरे को 90000 रुपये पगार के रुप में मिलेंगे। दोनों ही सरकार के कर्मचारी होंगे। यह अन्तर लगभग सोलह गुना बैठता है। यह ठीक है कि सभी कर्मचारी समान नहीं होते और कार्य की प्रकृति के आधार पर वेतन में विभिन्नता आवश्यक है किन्तु इतना अधिक अन्तर कहा¡ तक न्यायोचित है? विचार करने की बात है। वेतन में वृद्धि के पीछे मह¡गाई की दर को आधार बनाया जाता है। मह¡गाई की दर में वृद्धि की दलील देकर विधायिका, न्यायपालिका व कार्यपालिका के वेतनों में मनमानी वृद्धि हो जाती है। निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को मिलने वाले बड़े-बड़े पैकेजों को भी वेतन-वृद्धि का एक कारण प्रस्तुत किया जा रहा हैं। इसका आशय यही है कि निजी क्षेत्र में व्यवसायी वर्ग अनियिन्त्रत लाभ कमा रहा है, जो एक प्रकार से जनता का शोषण ही है। पू¡जीवादी अर्थव्यवस्था मेें व्यवसायी वर्ग अपने मुनाफे को आसमान की और ले ही जाता है।देश के आधार किसान व मजदूरों की स्थिति की चिन्ता किसी को भी नहीं है। यह ध्यान किसी को भी नहीं है कि मह¡गाई की मार उनको भी प्रभावित करती है। खाद्यान्नों की वृद्धि पर तो चिन्ता जाहिर की जा रही है किन्तु यह नहीं देखा जा रहा कि किसान के द्वारा उपभोग की जा रही प्रत्येक वस्तु की कीमत आसमान छू रही हैं, फिर उसके द्वारा उत्पादित खाद्यान्न की कीमत को लेकर ही इतना हो हल्ला क्यों मचाया जा रहा है? यहा¡ यह सुनििश्चत करने की आवश्यकता है कि खाद्यान्नों में होने वाली वृद्धि का लाभ किसानों को मिले। किसान व असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के जीवन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। उन लोगों पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है जो िशक्षा व स्वास्थ्य जैसी आधारभूत आवश्यकताओं के बारे में भी सोच नहीं पाते क्योंकि उनको अभी पेट की भूख शान्त करने से ही होश नहीं है। जनता की सेवा के नाम पर मौज लेने वाले जनसेवकों को काश! जनता की भी थोड़ी बहुत चिन्ता होती तो सुरसा के मुह¡ की भा¡ति वेतन-भत्तों में होती वेतन-वृिद्ध का उपभोग करते हुए भी जनता को विभिन्न समाज कल्याण योजनाओं के अन्तर्गत दिये जा रहे अनुदानों को चट नहीं कर जाते। किसी आलेख में पढ़ा था कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने किसी स्थान पर कहा था कि मैं अपने कर्मचारियों को इतना वेतन देना सुनििश्चत करू¡गा कि उन्हें भ्रष्टाचार की आवश्यकता न पड़े। यहा¡ पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि भ्रष्टाचार आवश्यकता की नहीं, मनोवृत्ति की उपज है। जिस प्रकार वेतन व भत्तों में वृद्धि हो रही है, उसी प्रकार भ्रष्टाचार में भी वृद्धि हो रही है। क्योंकि व्यवस्था लागू करने वाले लोग ही भ्रष्टाचार के संरक्षक हैं। इस स्थिति पर नियंत्रण न किया गया तो शीघ्र ही देश में अराजकता पैदा होने की संभावना बलवती होगी। ज्यों-ज्यों असमानता बढ़गी, त्यों-त्यों जनता में असंतोष बढेगा और सामाजिक सोहार्द्र की स्थिति खराब होगी। अत: अच्छा यही होगा कि सामाजिक मुद्दों
को सामाजिक स्तर पर ही ह
ल किया जाय। बढ़ते हुए वे
तन-भत्तों को नियंत्रित
किया जाय। न्यूनतम् मजदूरी अधिनियम से काम नहीं चलता, उसके साथ-साथ अधिकतम मजदूरी अधिनियम भी बनाया जाय।

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