खतरनाक है भ्रष्टाचार के प्रति संवेदनहीनता
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
वर्तमान समय में समाज में सबसे अधिक प्रचलित शब्द है- भ्रष्टाचार। भ्रष्टाचार सर्वव्यापक अवधारणा बन चुका है। इसका अर्थ करना चाहें तो बड़ा कठिन कार्य है क्योंकि भ्रष्टाचार अपने शब्दार्थ से ज्यादा महत्वपूर्ण व व्यापक हो चुका है। इस बात का पता लगाना मेरे जैसे अल्पज्ञ के वश की बात नहीं कि भ्रष्टाचार का प्रयोग सबसे पहले कहा¡ हुआ? इस ज्ञान के लिए तो केन्द्र व राज्य सरकारों को अनुसन्धान प्रारम्भ करा देना चाहिए। मेरा विचार तो यह है कि जब से मानव सभ्य व सुसंस्कृत हुआ है, भ्रष्टाचार अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहा है। कोई भी युग रहा हो, भ्रष्टाचार का अस्तित्व अवश्य ही किसी न किसी रूप में रहा है। वैसे हम विद्यालयों में पढ़ते हैं कि जब हमारा आचरण भ्रष्ट हो जाता है तब हम भ्रष्टाचारी कहे जाते हैं। हमारा आचरण कब भ्रष्ट होता है? यह पूछना ही बचकानी बात होगी। बल्कि पूछना यह चाहिए कि हमारा आचरण कब भ्रष्ट नहीं होता है?वर्तमान युग में भ्रष्टाचार कोई बुरी बात भी नहीं है। कौन नहीं चाहता कि उसका बेटा भ्रष्टाचार िशरोमणि का ताज पहन कर उसका नाम रोशन करे। अपनी प्यारी पुत्री के लिए भ्रष्टाचारी दामाद प्राप्त करने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते? कितना दहेज देते है? कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं ऐसा दामाद खोजने में। इसकी जानकारी बिना अनुभव के सुनी तो जा सकती है किन्तु महसूस नहीं की जा सकती। वास्तव में भ्रष्टाचार एक अनिवार्य बुराई के रूप में सामने आ रहा है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति सामाजिक जीवन में रहते हुए बिना कर्म के नहीं रह सकता, उसी प्रकार बिना भ्रष्टाचार के कोई व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है, यह कहना भी अविश्वसनीय होगा।
भ्रष्टाचार सभी देशों में व्याप्त है। हम यह भी कहें कि भ्रष्टाचार का वैश्वीकरण हो चुका है तो अतिशयोक्ति न होगी। इसका सबसे अच्छा प्रमाण है, अन्तर्राष्ट्रीय संस्था `संयुक्त राष्ट्र संघ की तेल के बदले अनाज योजना में भ्रष्टाचार की सूचनाए¡। यह तो एक नमूना मात्र है। मेरे विचार में विश्व का कोई भी देश भ्रष्टाचार से अछूता नहीं है। यदि वर्तमान समय तक सीमित न रहें तो प्रत्येक काल में भ्रष्टाचार की घटनाए¡ होती रही हैं। हा¡, मात्रा की घट-बढ़ होती रही है। इसी आधार पर विभिन्न युगों केे नाम रखे जाते रहे हैं। भ्रष्टाचार की मात्रा के आधार पर काल कोे चार वगोZ में वर्गीकृत किया गया है, वे हैं सतयुग, त्रेता, ,द्वापर, कलयुग। इनमें से किसी भी काल की बात करें, उस समय के ग्रन्थों में कोई न कोई भ्रष्टाचार की घटना मिल ही सकती है। कलयुग इन चारों कालों में सर्वश्रेष्ठ है। वास्तव में भ्रष्टचार के महत्व को चतुिर्दक मान्यता इसी युग में मिल पाई है। यही युग है जिसमें भ्रष्टाचारी को अपना मु¡ह छिपाने की आवश्यकता नहीं है। भ्रष्टाचार की जड़े जमीन के अन्दर तक फैल चुकी हैं। हा¡, हमारा ध्यान छोटे-छोटे भ्रष्टाचारियों पर नहीं जाता, इसका भी कारण स्पष्ट है, आजकल छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देने का समय किसके पास है? लाइफ बड़ी तेजी से दौड़ रही है। ऐसी स्थिति में छोटे-मोटे भ्रष्टाचार की बात उठाना ही टुच्चापन है। लेकिन सभी की हैसियत भी तो नहीं होती कि वे कोई बड़ा भ्रष्टाचार कर पायें।
खैर, मैं कुछ चन्द उदाहरण प्रस्तुत करना चाहता हू¡। एक बार की बात है, मैं आगरा दिल्ली रोड पर अपनी महान परिवहन निगम की बस सेवा का लाभ उठाने के लिए कोसी से होडल के लिए बस में चढ़ गया। रात्रि के लगभग सात बजे थे, सदीZ का समय था। परिचालक महोदय किराया वसूल करते हुए जब मेरे पास पहु¡चे तब तक बस दो किलोमीटर आगे सूनसान में दौड़ रही थी। मैने परिचालक महोदय को निर्धारित किराया देने के बाद जब टिकिट की मा¡ग की तो मेरी मन्द-बुिद्ध पर तरस खाकर परिचालक महोदय ने समझाया कि केवल पन्द्रह मिनट का रास्ता है, टिकट लेकर क्या करोगे? फिर मैं साथ हू¡ ना। जब मैंने टिकट लेने की जिद की तो उन्होंने मुझे बस से उतारने की धमकी दी। उन्होंने काफी बातें सुनाईं, यहा¡ तक कह दिया कि मुझे पता होता कि तू गांधी का चेला है तो मैं बस में बिठाता ही नहीं। जब उनकी किसी भी धमकी को मैंने नहीं माना और मैं अपनी बात पर टिका रहा तो उन्होंने अपनी धमकी को व्यवहार में ला दिखाया, और मेरी गलती की सजा देते हुए मेरे रुपये फेंक कर मुझे सूनसान सड़क पर पटक कर भ्रष्टाचार का विरोध करने की सजा दे दी। मुझे उन परिचालक महोदय के द्वारा इस प्रकार उतारा जाना नहीं अखरा। मैंने उनकी आमदनी में सहयोग नहीं किया। अत: उन्होंने, जो वह कर सकते थे, वह किया। मुझे आश्चर्य इस बात पर हुआ कि पूरी बस में से एक भी सवारी परिचालक महोदय के कार्य के विरोध में खड़ी नहीं हुई जो संवेदनहीनता की स्थिति को रेखांकित करती हैं। यह घटना तो एक उदाहरण मात्र है। आपको अपने चारों तरफ ऐसी दो-चार घटनाओं से रोज ही रूबरू होना पड़ता होगा। आप किसी भ्रष्ट अधिकारी की िशकायत करने के लिए तैयार होते हैं तो ऐसे लोगों की कमी नहीं रहेगी जो आपको समझायेंगे कि आपको क्या करना है? आप अपने काम से काम रखो। हो सकता है कि आपके घरवाले और आपके घनिष्ठ मित्र भी आपको भ्रष्टाचार के विरूद्ध खड़ा देखकर आपका साथ छोड़ दें क्योंकि इससे उनके निजी हित पर प्रभाव पड़ने का खतरा पैदा हो जाता है या प्रभावशाली अधिकारियों से सम्बन्ध खराब होने का भय आड़े आ जाता है।
इस सन्दर्भ में एक बहुत अच्छा उदाहरण याद आता है। एक सज्जन की नई-नई नौकरी लगी थी, वे नहीं जानते थे कि भ्रष्टाचार का विरोध करना सरकारी नौकरी में कितना मह¡गा पड़ता है। उनकी संस्था में बीस टिन रिफाइन्ड तेल की खरीद हुई। सामान की सत्यापन समिति में उनका नाम था। उन्होंने देखा कि जिस ब्राण्ड का तेल होना चाहिए टिन तो उसी ब्राण्ड के हैं किन्तु उनकी सील टूटी हुई है। जब यह बात उन्होंने पूर्तिकर्ता के सामने रखी तो पूर्ति कर्ता ने उन सज्जन को रोबीले अन्दाज में समझाया,`टेण्डर में यह ब्राण्ड लिखा था किन्तु सील भी लगी होगी ऐसा कोई उल्लेख टेण्डर में नहीं था। लेकिन वे सज्जन समझने को तैयार ही न थे, उन्होंने तेल स्वीकार करने से साफ मना कर दिया तो वरिष्ठ समिति सदस्य ने भी उन सज्जन को ही समझाया, जब वे न माने तो समिति के वरिष्ठ सदस्य उन्हें संस्था प्रधान के पास ले गये। संस्था प्रधान ने भी उन्हें समझाया, धमकाया, किन्तु जब वे मूखाZधिराज किसी भी प्रकार बिल पर हस्ताक्षर करने को तैयार नहीं हुए तो उनसे कह दिया गया कि कल तेल वापस कर दिया जायगा और तेल भण्डार से बाहर ही अलग से रख लिया गया। दो-चार दिन बाद, समझदार सदस्यों की दूसरी समिति का गठन कर उस तेल को स्वीकार कर लिया गया। संस्था प्रधान ने उन ईमानदारी के ठेकेदार सज्जन को देख लेने के दूसरे रास्ते तलाशे और समय-समय पर उनका प्रयोग करके उनको प्रतािड़त करते रहे। वे सज्जन इतने पर भी बाज नहीं आये, और उन्होंने कुछ तथ्य जुटाकर उच्चाधिकारियों को िशकायत कर दी। मजबूर होकर उच्चाधिकारियों को एक जा¡च समिति का गठन करके, मामले की जा¡च के लिए भेजना पड़ा। समिति के सम्माननीय सदस्यों ने भी उन सज्जन को समझाने का पूरा प्रयास किया कि उनका काम ईमानदारी सुनििश्चत करना न होकर अपने अधिकारी की आज्ञा का पालन करना है। और सभी तथ्यों को नजर अन्दाज करके उन सज्जन को ही िशकायत करने का दोषी मान कर उन्हें सुझााव दिया गया कि वे अपने अधिकारी के साथ ताल-मेल बिठाकर कार्य करें अन्यथा उनके विरूद्ध कड़ी कार्यवाही की जायेगी। यही नहीं इतने पर भी पर्याप्त समय देने के बाबजूद, वे सज्जन अपनी आदत से बाज नहीं आये तो संभागीय कार्यालय में बुलाकर संभागीय अधिकारी ने स्पष्ट कहा कि लगता है,`आप के अन्दर ईमानदारी के कीड़े कुछ ज्यादा ही कुलबुला रहे हैं। अपने अधिकारी से ताल-मेल बिठाकर चलो अन्यथा नौकरी से हाथ धो बैठोगे।´ यही नहीं संस्था में होने वाले सभी महत्वपूर्ण कायोZ से उसे हटा दिया गया ताकि आर्थिक मामलों में उसकी आवश्यकता ही न पडे़े। यह एक नमूना है,अपने यहा¡ की नौकरशाही के कार्य करने के ढंग का। ऐसे उदाहरण आपको प्रत्येक विभाग में कदम-कदम पर मिल जाये्रगे। पुलिस व राजस्व विभाग तो बदनाम है ही िशक्षा विभाग भी पीछे नहीं। आप किसी भी विश्वविद्यालय की डिग्री बिना परीक्षा दिये ही पा सकते हैं। सेना में भी भर्ती कराये जाने के नाम पर दलालोे द्वारा धन वसूलने के मामले उजागर होते ही रहते हैं। कहने का आशय यह है कि सभी विभाग एक ही कार्य संस्कृति का पालन करते हैं। कहीं भी कुछ कराना है तो भेंट-पूजा व प्रसाद के बिना कैसे हो सकता है?
रही बात नेताओं की तो हमारे नेता-गण पीछे कैसे रह सकते हैं,आखिर वे हमारे मार्गदशZक है,भारत के भाग्य विधाता हैं। उनके काले कारनामे तो प्रतिदिन अखबार में छपते ही रहते हैं। यही नहीं सांसदों के लिए तो 23 दिसम्बर 1993 को एमण्पीण्लोकल डवलपमेन्ट फण्ड के नाम से भ्रष्टाचार की वैधानिक शुरूआत ही कर दी। इस पर लगाये जाने वाले आरोपों, विभिन्न सर्वेक्षणों, लेखा परीक्षकों के प्रतिवेदनों के कारण लोकसभा अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटजीZ अनेक बार इसे समाप्त करने की सलाह दे चुके हैं, किन्तु इसकी रािश को ही बढ़ाये जाने की मा¡ग सदैव उठती रहती है। एक अनुमान के अनुसार गरीब जनता का प्रत्येक सांसद पर 1100 रुपये प्रतिदिन खर्च होता है( मंत्री महोदय पर 7000 रुपये प्रतिदिन तथा संसद की कार्यवाही पर 27500रुपये प्रति मिनट होता है। संसद में जनता के हित में कितनी गंभीर चर्चाएं होती हैं यह बताने की आवष्यकता नहीं है। गरीब जनता को दी जाने वाली अनुदान सहायता के लिए काट-छा¡ट करने वाली सरकार के लिए सांसदो,विधायकों व मंत्रियों के वेतन भत्ते व सुविधाएं बढ़ाने के लिए कभी वित्त-मंत्रालय की आपत्ति आड़े नहीं आतीं। इसके बाबजूद सांसद संसद में प्रष्न पूछने के लिए मोटी-मोटी रकम लेते हैं यह वर्तमान ऑपरेषन दुयोZधन से स्पश्ट हो चूका है। नैतिकता, सदाचरण किस हद तक गर्त में जा रहे है? हम कितने बेषर्म होते जा रहे हैं? यह इस बात से ही स्पश्ट हो जाता है कि अभी तक किसी भी सांसद ने अपना त्याग-पत्र नहीं दिया है। इससे पहले भी तहलका काण्ड सामने आ चुका था किन्तु क्या हुआ। गन्दगी को सामने लाने वाले पत्रकारों को ही परेषान किया गया विभिन्न प्रष्न उठाये गये कि इतने बड़े कार्यक्रम को अंजाम देने के लिए,इतनी बड़ी धनराषि कहा¡ से आई( वही बात उल्टा चोर कोतवाल को डा¡टें। तहलका मामले से पूर्व सांसदों को नोट देकर वोट लेने का मामला भी पूर्व प्रधानमंत्री श्री नरसिम्हा राव के समय में आया था। अब जनता इतनी अभ्यस्त हो चुकी है कि सबको पता है कि कोई भी कितना भी बड़ा घोटाला हो( कुछ नहीं होने वाला क्योेंकि चोर-चोर मोसेरे भाई। हमाम में सब नंगे हों, तो पर्दा कौन उठाये।
कहने का आषय यह है कि भ्रष्टाचार हमारी रग-रग में समा चुका है। हम इसके अभ्यस्त हो चुके है। इसके प्रति हमारी संवेदनाएं मर चुकी हैं। वास्तव में कोई भी बुराई समाज के लिए खतरा नहीं बन पाती, जब तक समाज उस के प्रति संवेदनशील व जागरूक रहता है। किसी भी बुराई के प्रति संघशZ समाज को मजबूत बनाता है,किन्तु जब समाज की संवेदना ही मर जाये। बुराई के प्रति इतना अभ्यस्त हो जाये कि उसे बुराई कहने में ही संकोच हो तो क्या होगा? इसकी कल्पना ही बड़ी भयावह है। यह ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार किसी व्यक्ति के ‘ारीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ही चुक जाय। यदि किसी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता ही समाप्त हो जाय तो उसका जीवन कितना मुिष्कल हो सकता है? उसका जीना कितना भयावह हो सकता है? इसको कोई एड्स का मरीज ही बता सकता है। एड्स एक ऐसा रोग है जिसमें व्यक्ति की रोग-प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जाती है और उसे कोई भी रोग लग जाय वह ठीक नहीं हो पाता। ठीक उसी प्रकार भ्रश्टाचार समाज के लिए एड्स रोग की तरह है। यह इतने व्यापक रूप में फेल चुका है कि इसने हमारी संवेदनाओं को ही मार दिया है। समाज के इस घातक रोग से बचाव का एक ही उपाय है कि हम अपनी संवेदनषीलता को जागरूक करें प्रत्येक व्यक्ति इस मसले पर जागरूक हो। जानकारी व बचाव ही इस का एक मात्र उपचार है। भ्रश्टाचारियों को न केवल कानूनी सजा दी जाय, बल्कि सामाजिक रूप से भी उनको बहिश्कृत किया जाय ताकि वे इस संक्रामक बीमारी को और न फैला सकें। इसके लिए हमें जागरूक होना होगा। हम किसी भी स्तर पर किसी भी रूप में, कहीं भी कार्यरत हों, बिना झू¡ठी अनुषासनात्मक कार्यवाही से डरे, सभी प्रकार के जोखिम उठाते हुए, यदि आवष्यक हो तो व्यवस्था से विद्राह भी करते हुए( इस भयानक बीमारी से अपने देष व समाज को मुक्त करने के प्रयत्न करें। तभी समाज व देष को बचाया जा सकता है।

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