आत्म हत्या
रो-रो के बुरा हाल था मीना का एक यही तो साधन था उसके पास अपने अन्त:करण से अपनी पीड़ा को निकालने का। अपने बोझ को हल्का करने का। दिन में तो इसके लिये भी समय नहीं था। पूरे दिन काम ही काम। सुबह तीन बजे उठना पूरे दिन काम करते रहना रात्रि 11 बजे तक काम करना । इस समय सब सो जाते थे। अत: रो-रोकर अपनी पीड़ा को हल्की करती और सो जाती यह उसकी प्रतिदिन की दिनचर्या बन गयी थी।
मीना काम से नहीं डरती थी काम तो कितना भी करना पड़े किन्तु थोड़ा सा प्यार तो मिले। फिर भी शरीर के लिये भोजन और विश्राम तो चाहिये ही। भोजन के नाम पर दोपहर दो बजे, बची खुची तीन चार रोटी सब्जी तो कभी बचती ही न थी तथा रात्रि को साढ़े दस बजे बची खुची एक दो रोटी। विश्राम के नाम पर 20 घण्टे काम करना तथा बात बात पर सभी की डा¡ट। माताजी (सास) तो सदैव डा¡टती रहती है बड़ी धीरे-2 काम कर रही है तुझे महारानी की तरह बिठालू¡गी तेरे बाप ने तेरे लिये बहुत सारा धन जो दिया है।
मीना के सभी सुनहले सपने चूर-चूर हो गये पिता की गरीबी के कारण। दहेज न लाने पर ही तो उसे इतना सताया जाता है। आखिर उसकी देवरानी भी तो है उसको कोई नहीं डा¡टता उससे कोई नहीं कहता काम करने की। आखिर वह अपने माय के से दहेज जो लायी है। पूरे दिन सज धज कर घूमती रहती है व्यक्तिगत काम भी उसी से करवाती है। पिताजी ने दहेज नहीं दिया तो क्या गलती है आखिर मीना की। कितने परिश्रम से पढ़ाई की उसने। कितना प्रयास करती है अपने सास ससुर को प्रसन्न करने का। किन्तु वह तो दहेज के नाम पर डा¡टते रहते हैं। क्या उपाय है इससे बचने का? क्या चारा है? सभी कुछ समाप्त हो गये सपने। एक ही उपाय बचा है करने के लिये आत्महत्या !

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