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आर्दश


आर्दश

आदर्श दीवारों पर लिखने के लिए होते हैं, चलते समय नीचे देखकर चलना पड़ता है। यदि चलते समय दीवारों पर लिखे आदर्शो पर दृष्टि रखते हुए भी अपना लक्ष्य या गंतव्य पा लिया और आदर्शोँ को व्यवहारिकता को प्रमाणित कर दिया तो भी लोग आदर्शोँ का अनुकरण नहीं करेंगे। लोग तुम्हारी प्रशंसा करेंगे, सराहना करेंगे, हो सकता है कुछ अंधभक्त चित्र लगाकर पूजा भी करने लगें किन्तु यह नििष्चत है कि आदर्शोँ के मार्ग पर कोई नहीं चलेगा। लोग महर्षि दयानन्द, राजा राम मोहनराय, स्वामी विवेकानन्द आदि महापुरूषों की पूजा करते हैं किन्तु उनके द्वारा बताये गये विचारों को नहीं अपनाते। हमारों यहां व्यक्ति पूजा कर लाभ कमाने की परम्परा है विचार या कर्म पूजा कर कष्ट उठाने की नहीं। अत: मेरी बात मानों इस परम्परा को कोई नहीं मिटा सकता। इसके विरोध में पड़कर क्यों अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक सुखों को दांव पर लगा रहे हो ?`` आदर्श के मित्र द्वारा 12 वर्ष पूर्व प्रकट किये गये विचार एक-एक करके आदर्श के मस्तिष्क में तूफान मचाये थे।
उसके द्वारा आदशोंZ, सिद्धान्तों की व्यवहारिकता की बात करने पर आदर्श के मित्र उसकी मजाक उड़ाया करते थे। कुछ साथी ऐसे भी थे जो उसकी बात का समर्थन करते थे। उसका सम्मान करते थे। एक-दो शुभ-चिन्तक ऐसे भी थे जो उसको समझाया करते थे कि वह अव्यावहारिक सिद्धान्तों व आदर्शोँ के चक्कर में फंसकर अपने भविष्य को दांव पर न लगाये। उनमें से ही एक थे-डाण् बनवारी लाल जी शर्मा। श्री बनवारी लाल जी ने एमण्एण् संस्कृत से किया था व उस समय शोध कार्य कर रहे थे। बाद में संस्कृत में पीण्एचण्डीण् करने के बाद एम.ए. हिन्दी से भी किया। आज उन्हीं के विचार आदर्श के मस्तिष्क में अपना स्थान बनाने का असफल प्रयास कर रहे थे।
आदर्श बचपन में धार्मिक प्रवृत्ति का बालक था। व्रत रखने, पूजा -पाठ करने में उसे विशेष आनन्दानुभूति होती थी। एक बार जो नियम बना लिया, उसका पालन अनेक कष्ट उठाकर भी किया करता था। उसकी इस प्रवृत्ति के मूल में दो करण थे-प्रथम प्रत्येक अच्छे कार्य को स्वयं करने में बाल-सुलभ उत्साह, द्वितीय पारिवारिक वातावरण धार्मिक कर्मकाण्ड व पौरोहित्य कर्म वाला होना। आदर्श के पिता जी ने एक अत्यन्त गरीब परिवार में जन्म लिया था। केवल गरीब ही नहीं, पूर्णत: अिशक्षित, अंधविश्वासों से ग्रस्त व परिवार के नाम पर पशुतुल्य आपसी व्यवहार अथाZत पारिवारिक व्यवस्था नाम की चीज न थी। भूत-प्रेतों की पूजा, अंधविश्वास से पूर्ण अनुष्ठान अवश्य किये जात भले ही किसी बीमार व्यक्ति कोदवा दिलाने की व्यवस्था न हो सके। उन परिस्थितियों में भी न जाने कैसे ? आदर्श के पिता जी ने पांचवीं तक की िशक्षा प्रगाप्त की। आगे परिस्थितिवश घर छोड़ना पड़ा। वषोZं इधर-उधर भटकते रहे। इस दौरान क्या-क्या न किया होगा ? कितने कष्ट सहे होंगे ? इसका आभास आदशZ को पहले न था किन्तु स्वयं की भटकर के बाद हो गया। समय चक्र चलता रहा। अन्तत: आदषZ के पिजा जी को ईश्वर, धर्म व कर्मकाण्ड को ही अपनी आजीविका का साधन अथाZत पेशा बनाना पड़ा।
बालक में सत्य-असत्य, वास्तविक-अवास्तविक में अन्तर कर पाने वाली शक्ति विवेक तो होता नहीं। बच्चे को तो बता दिया जाये उसे ही सत्य मान लेता है। अत: ध्रुव व प्रहलाद की कहानियों से प्रेरणा लेकर, तपस्या करने की इच्छा बलवती होती। इसी प्रकार की भव तरंगों से वशीभूत आदशZ ने बचपन में कम से कम तीन बाद घर छोड़कर भागने का प्रयत्न किया, किन्तु समय रहते उसके पिजा जी खोजकर वापस घर ले आये और वह धर्म के ठेकेदार साधुओं के चंगुल में फंसने से बच गया।
अध्ययन करने के दौरान आदशZ को बौिद्धक विकास हुआ। स्वतंत्र चिन्तन व विवेक के परिणाम स्वरूप उसकी धर्म व इश्वर सम्बन्धी अवधारणाएं परिवर्तित हुई। ईश्वर किसी एक स्थान या एक आकृति में नहीं हाता वह सर्वव्यापक है। आदशZ ने समझा कि धर्म का ठेका किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया गया है। ईश्वर ने सभी को समान बनाया है। भेदभव तो मनुष्य ने बनाया है जो धार्मिक कृत्यनहीं। सामाजिक विकास, जनकल्याण, धर्मनिरपेक्षता या सम्प्रदाय निरपेक्षता, समानता आदि अवधारणाओं के चिन्तन, अध्ययन व मनन के फलस्वरूप, कथित धर्म, कर्मकाण्ड, अन्ध विश्वास, रूढ़ियों आदि से उसका विश्वास उठ गया। धर्म के ठेकेदारों पण्डितों, पुजारियों, पादरियों व मौलवियों के प्रति उसकी श्रद्धा समाप्त हो गयी और यह सब उसका पारिवारिक व्यवसाय था। अत: परिवार से टकराव होने लगा।
सामाजिक विकास, लिंग भेद व वर्ण भेद की समाप्ति, िशक्षा विशेषकर स्त्री िशक्षा का प्रसार उसके प्रिय विषय बन गये। बचपन का प्रत्येक अच्छे विचार को स्वयं अपनाने का अग्रह और भी दृढ़ हो गया। आदशZ सिद्धान्तों को लेखन व वार्ताओं तक सीमित देखकर अत्यन्त दु:खी होता। उसके अनुसार जब तक किसी सिद्धान्त का व्यवहारिक प्रयोग नह हो, वह सिद्धान्त नहीं, एक ढकोसला मात्र है। उसके अनुसार प्रयोग करके ही आदशZ व सिद्धान्तों की प्रामाणिकता सिद्ध किया जा सकता है। जीवन के उन्नयन व विकास का मार्ग सिद्धान्तों के व्यावहारिक प्रयोग करने से होकर गुजरता है। सिद्धान्त व आदशZ भाषणों व निबन्धों की विषय वस्तु न होकर व्यवहार व आचरण की विषय वस्तु है। अत: इनके प्रचार-प्रसार व बढ़ावा देने के इच्छुक व्यक्ति को सर्वप्रथम इन्हें अपने आचरण का अंग बनाना चाहिए अन्यथा उसके द्वारा किये गये परिश्रम का कोई महत्व नहीं होता अथाZत उसके सारे प्रयास निष्फल हो जाते हैं। अपने स्वयं के जीवन में लागू करके ही अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते हैं।
सिद्धान्तों व आदशोZं को अपने जीवन में उतारने के कारण ही उसका किसी से भी समन्वय नहीं हो पाया। उसने संकल्प किया था कि उसक जीवन में जाति भेद, लिंग भेद प्रान्त भेद व सम्प्रदाय भेद का कोई स्थान नहीं होगा। बाल-विवाह, दहेज प्रथा, पर्दाप्रथा व नारी भेदभव व शोषण को मिटाने हेतु कार्य करेगा। जिन परिवारों में दहेज का लेन-देन होता है, उन परिवारों में आयोजित विवाह समारोहों में हिस्सा नहीं लेगा। जिन परिवारों में महिलाओं को िशक्षा के अधिकार से वंचित रखा जाता है तथा पर्दे में रहने को मजबूर किया जाता है, उन्हें इन कुप्रथाओं को छोड़ने को राजी करने का प्रयास करता रहेगा।
इन्हीं सब सिद्धान्तों व आदशोZं को अपने जीवन में उतारने के प्रयास में, आदशZ ने एक ऐसी युवती को जीवन संगिनी बनाया जो विधवा, विजातीय, बेसहारा थी। जिसको उसके मां-बाप व ससुराल वाले दोनों अपने घर से निकालकर आश्रम में समर्पित कर चुके थे। वह आश्रम में जीवन गुजारने को मजबूर थी। आदशZ ने तय किया कि वह स्वयं पढा-खिाकर योग्य बनायेगा और उसे भी सामाजिक दायित्वों का बोध कराकर अपने साथ जीवन यात्रा करने में सक्षम बनायेगा। यही नहीं शादी के पश्चात िशक्षा व विकास के पूरे अवसर दिये। प्रत्येक ऐसा प्रयत्न किया जिससे उसका मानसिक, शारीरिक व बौिद्धक विकास हो। पत्नी ने भी अपनी क्षमताओं, योग्यताओं व सामथ्र्य के अनुरूप कभी कर्तव्यपालन में कोताही नहीं बरती।
दूसरी ओर उसे अपने परिवार, जाति व गांव के बहिष्कृत होना पड़ा। जिस समाज की नींव असत्य, अंधविश्वास, रूढ़ियों, जातिवाद व धर्मांन्धता पर टिकी है। वह आदशZ को कैसे बर्दाश्त करता। जिस घर का व्यवसाय ही जातिवाद फैलाने, धर्म को कुपरिभाषिति करने व ईश्वर को बेचने पर आधारित था। उस घर में आदशZ को कैसे रहने दिया जाता। माताजी-पिताजी, भाई-बहन व अन्य सभ सगे-सम्बन्धी असंतुष्ट थे। पिताजी ने स्पष्ट लिखा था कि यदि तुम अपनी पत्नी को लकर इस घर में आये तो तुम दोनोें को गोली मार दी जायेगी। वह अकेला माताजी-पिताजी से मिलने के उद्देश्य से जब भी गांव जाता, पिताजी उससे बात तक न करते थे। उसे लगता कि अब वह इस घर में अवांछित है तथा उसे इस घर में नहीं आना चाहिए किन्तु वह माताजी-पिताजी को छोड़ कैसे सकता था ? माताजी का अगाध स्नेह वह अब भी महसूस करता किन्तु वे पिताजी व छोटे भाई के सामने मजबूर थीं। परिवार वाले उससे अब भी प्रेम का नाटक करते हुए कहते कि वह घर रहे। उसे हंसी आ जाती अपनी पत्नी को छोड़कर घर रहे, ऐसा सोच भी कैसे लेते हैं ये लोग। अपनी पत्नी को छोड़कर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ ले। परम्पराओं व झूंठे आडम्बरों के कारण अनैतिक मार्ग अपना ले। नहीं, यह नहीं हो सकता। आदशZ न तो अपनी पत्नी को छोडे़गा, न ही मां-बाप को। वह पुत्र व पति दोनों के कत्र्तव्यों का पालन करने में प्रयास करेगा।
आदशZ केवल पारिवारिक बहष्कार का ही िशकार न था। वह बेरोजगारी से पीिड़त था। आदशZ ने स्नातकोत्तर प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर िशक्षक प्रिशक्षण प्राप्त किया थ्क्ाा किन्तु फिर भी वह नौकरी के लिए दर-दर भटकर रहा था। इसमें भी उसके सिद्धान्त आडे़ आ रहे थे। नौकरी बिना जैक और चैक के तो मिलती नहीं, और आदशZ को रिश्वत व सिफरिश दोनों से चिढ़ थी। तिगड़म लगाना व चापलूसी करना उसे पसन्द न था जबकि प्राइवेट विद्यालयों में चापलूसी, तिगड़म व शोषण ने अपना साम्राज्य स्िािापत कर रखा था। अत: उसे यहां से वहां भटकना पड़ता। कहीं भी एक वषZ तक न रहने दिया जाता। ऐसी स्थिति में अपनी पत्नी को साथ कैसे रखता ? जिसको आज से कल का पता न हो। जो ऐसी नौकरी कर रहा हो, जिसमें मालिक सायं को विद्यालय छोड़ते समय कह सकता हो, ´मास्टर जी अब आपकी सेवाओं की आवश्यकता नहीं, कल से विद्यालय न आना।` अपनी पत्नी को िशक्षा भी दिलानी थी। उसके स्वास्थ्य में भी सुधार लाना था। अपने साथ रखकर उसे कष्टों व चिंताओं में ही जीवन गुजारा है उसका। उसे अपनी चिन्ताओं व कष्ट बताता भी न था। उसका प्रयास रहाता वह भले ही अपने खाने-पीने में कमी कर ले, किन्तु पत्नी को कोई कमी न हो। अत: आदशZ ने अपनी पत्नी को उसी के परिवेश में, जहां वह मिली थी किराये पर कमरा लेकर रखा हुआ था। वहीं उसे हाई स्कूल का फार्म भरवा दिया था। ताकि वह अपनी िशक्षा पूरी कर सके।
जब तक उसने शादी न की थी आदशZ को कोई परेशानी न थी। किसी भी विद्यालय में पढ़ाता, अपना खर्चा तो चल ही जाता था। घर पर कोई विशेष समस्या न थी, आवश्यकता पड़ने पर घर से भी कुछ न कुछ मिल ही जाता था। यदि परम्परानुसार माताजी-पिताजी की इच्छा से शादी करता तो भी किसी समस्या का सामना न करना पड़ता। पिजाती दहेज के नाम पर लाख-दो लाख वसूलते। लड़की पढ़ी-लिखी होती, साथ में रहकर पढ़ाती तो धनार्जन में सहयोगी बनती। घर पर भी रहती तो भी आदशZ की चिंता का विषय न था। माताजी-पिताजी के रहते उसे क्या चिन्ता करनी थी। पूरा पारिवारिक संरक्षण मिलता, किन्तु उसे वह आित्मक सुखानुभूति न होती, जो आज भूखा रहने के बावजूद होती है। वह ऐसा नहीं कर सकता था क्योंकि वह सुख-सुविधाओं व भोग-विलास के लिए नहीं जीता, वह तो आदशोंZ व सिद्धान्तों के कलए जीता हैं वह कष्ट सहने के लिए जीता है। संघषZ करने के लिए जीता है। आज वह संघषZ ही तो कर रहा है। संघषZ अपनी पारिवारिक रूढ़ियों से, संघषZ सामाजिक कुप्रथाओं से, आर्थिक परिस्थितियों से, आर्थिक परिस्थितियों से, अपनी पत्नी के अंधविश्वासों से, उसकी निरक्षरता से।
आर्थिक परिस्थितियां तो भीषण हैं, उनका कोई समाधान नहीं सूझता वे दिन प्रतिदन जजिट से जटिलतर, जटिलतर से जटिलतम बनती जा रही है। प्राईवेट नौकरी से पहले ही खर्च पूरा न पड़ता था।
आदशZ धर्म संकट में फंस गया है। उसे 2000 रूपये मासिक वेतन मिलता है, जबकि एक बिना पढ़ा-लिखा कुशल मजदूर भी 150 रूपये दैनिक से कम मजदूरी नहीं लेता। किन्तु आदशZ की मजबूरी है आज तक तो अपना और पत्नी का खर्च ही ठीक से नहीं चलता था। दोनों के अलग-अलग रहने के कारण खर्च भी दुगना पड़ता था। कई बार भूखा सोया है आदशZ। इन सभी कठिनाईयोंव कष्टों की चर्चा भी किसी से नहीं कर सकता। पत्नी को बताकर मानसिक रूप से दुखी नहीं कर सकता। वह बेचारी कर भी क्या सकती है ? परिवार पिजाती व भाई से किसी सहानुभूति व सहयोग की बजाय हंसी ही उड़ेगी। उन्हें प्रसन्नता होगी कि हमारी बात नहीं मानी। सिद्धान्तवादी बना फिरता था अब भेग। अत: आदशZ की मजबूरी है कि समस्त कठिनाईयों व कष्टों को मुस्कुराते हुए सहन करना है। अपने नैतिक, पवित्र व सच्चे धर्म के रास्ते पर आगे बढ़ना है। संघषZ व कठिनाईयों से डरकर आदशोZें व सिद्धान्तों से समझौता करने वालों में वह नहीं है।
आज ही आदशZ को अपनी पत्नी का पत्र प्राप्त हुआ है जिसके द्वारा पत्नी ने सूचना दी है कि वह एक लड़के का बाप बन गया है। यदि यह सूचना परम्परानुसार शादी के पश्चात उसके परिवार में मिलती तो परिवार में खुिशयां मनाई जातीं। पिताजी मिठाई बांटते किन्तु आदशZ के लिए यह सूचना खुशी प्रदान करने वाली न थी। उसके दायित्वों में वृिद्ध हो गयी, चिंताएं और बढ़ गयीं। अब पत्नी व बेटे दोनों की िशक्षा स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति वह कैसे करेगा ? पत्र पढ़ते-पढ़ते उसकी आंखों से अश्रुधारा बह निकली क्योंकि पत्र में आगे पत्नी ने लिखा था कि प्रसव के समय पत्नी अपने कमरे पर अकेली थी। उसकी सहायता करने वला कोई न था। आज आदशZ को अपने मित्र के शब्द याद आ रहे थे कि आदशोंZ व सिद्धान्तों कोदीवारों पर लिखा जाता है जीवन यात्रा करते समय नीचे देखकर चलना पड़ता है।
उसके मित्र के विचार घुमड़-घुमड़कर उसके मस्तिष्क में अपना स्थान बनाने का असफल प्रयास कर रहे हैं तभी उसे एक कवि की ये पंक्तियां स्मरण हो आती हैं-
नदियों को पार करना ही पौरूष का काम है।
बहाव के साथ तो लाशें भी बहती जाती हैं।।
आदशZ के चेहरे पर मुस्कान खेल उठती है। संघषZ करने का संकल्प दृढ़तर हो जाता है।

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