चिन्ता छोड़ो-सुख से नाता जोड़ो
सभी प्राणी सुख के अभिलाषी होते हैं। मानव एक बुिद्धजीवी प्राणी है। अत: वह सुख की अभिलाषा में बड़ी-बड़ी योजनाए¡ बनाता है। विभिन्न संसाधन जुटाता है। भौतिक, सामाजिक व आध्याित्मक उन्नति के लिए दिन-रात एक कर देता है। अपने परिश्रम, लगन, निष्ठा व संकल्प-शक्ति के बल पर उपलब्धिया¡ भी हासिल करता है किन्तु कुछ अंजानी आशंकाए¡, भविष्य के प्रति अनििश्चतताए¡, जोखिम की संभावनाए¡ उसे सदैव घेरे रहती हैं। व्यक्ति कितना भी संपन्न हो जाय, वह कितना भी विकास कर ले किन्तु चिंताए¡ उसका पीछा नहीं छोड़ती। ये चिन्ताए¡ उसे चैन से रहने नहीं देतीं। व्यक्ति स्वयं जानता है कि चिंता चिता से बढ़कर नुकसानदायक है। वह जानता है कि चिता तो व्यक्ति को मरने के बाद जलाती है किन्त चिंता तो जीवित व्यक्ति को ही जलाकर खाक कर देती है। चिन्ता दीमक की तरह है, जिस प्रकार दीमक किसी पेड़ को अन्दर से खोखला करके नष्ट कर देती है ठीक उसी प्रकार चिन्ता एक ह¡सते-खेलते इन्सान को बीमारी व मौत के मु¡ह में ढकेल देती है। वस्तुत चिन्ता किसी समस्या का समाधान नहीं है। चिन्ता स्वयं ही एक समस्या है, एक ऐसी समस्या, जिसको छोड़े बिना मनुष्य किसी भी स्थिति में सुखी नहीं हो सकता। चिन्ता के अवगुणों का प्राचीन काल से ही ऋषि-महर्षि बखान करते रहें हैं प्रत्येक युग में चिन्ता से दूर रहने के उपदेश दिये जाते रहे हैं। प्राचीन ही क्यों आधुनिक विचारक, चिन्तक,दाशZनिक व प्रबन्धशास्त्री भी चिन्ता की समस्या को समझते हैं तथा इससे मुक्त रहने के विभिन्न उपाय बताते रहते हैैं। किन्तु बहुत कम लोग ऐसे मिलते हैं जो चिन्ता मुक्त हो पाते हैं, और जो चिन्ता मुक्त हो जाते हैं। संसार में उनके लिए कोई दुख शेष नहीं रहता। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि चिन्ता ही समस्त दुखों की जड़ है, यदि हम चिन्ता से मुक्त हो जाय¡ तो दुख हमारे सामने फटक भी नहीं सकता। वास्तव में चिन्ता ही दुखों की जननी है। अत: सुखी रहने के लिए, दुखों को भगाने के लिए चिन्ता-मुक्त होने की जरूरत है। आओ हम विचार करें, जीवन में चिन्ता -मुक्त कैसे रहा जा सकता है-
सबसे पहले हमें चिन्ता और चिन्तन में अन्तर करना आना चाहिए। चिंता जहा¡ हमें दुखों की नदी में ढकेलती है( चिन्तन वहीं हमें दुखों की नदी से निकलने का मार्ग सुझाता है। हमें उन संसाधनों से अवगत कराता है जिनकी सहायता से हम उस दुखों की नदी से बाहर निकल कर सुखों के बगीचे में विहार कर सकते हैं। चिंतन हमें वह रास्ते सुझाता है, हमें उन संसाधनों की प्राप्ति के उपाय बताता है जिनकी सहायता से हम चिंता मुक्त हो सकते हैं। किन्तु ये उपाय तभी निकल कर आयेंगे जब हम चिंतन और चिन्ता में अन्तर समझ कर चिन्तन करेंगे। वास्तव में अधिकांश लोग चिन्तन के नाम पर भी चिन्ता करते हैं या चिंतन करना प्रारंभ करते हैं तथा थोड़े समय बाद चिन्ता करने लगते हैं और दुखो के महासागर में गोते लगाने लगते हैं। वास्तव में चिंता और चिंतन दोनों ही मानसिक क्रियाएं हैं। अत: अन्तर करना मुिश्कल हो जाता है। सामान्यत: गुजरी हुई घटनाओं पर लंबे समय तक सोचते रहना, अपने को असहाय महसूस करना चिंता की क्षेणी में आता है तो गुजरी घटनाओं से सीख लेकर भविष्य को सुन्दर बनाने के व्यवहारिक रास्ते तलाशना ही चिंतन कहलाता है। हमें जागरूक रहने की आवश्यकता है कि हम चिंतन करें और जैसे ही हमारा चिंतन चिंता की स्थिति में जाने लगे, हम सोचना बन्द करके कोई ऐसा कार्य करने लगे जिससे क्षणिक ही सही, हमें आनन्द की प्राप्ति हो।
हमें अपनी डायरी में यह लिख लेना चाहिए कि मुझे चिन्ता नहीं, चिन्तन करना है। डायरी में ही नहीं अपने कमरे में सहज-दृश्यवान स्थान पर लिख कर लगा लेना चाहिए ताकि बार-बार उस पर हमारी नजर जाय और हम उसे आत्मसात कर सकें। चिन्तन-मनन के फलस्वरूप योजना बनाकर उसके क्रियान्वयन में जुट जाना है। मेरी सारी समस्याओं का समाधान हो जायेगा। हमें हर समय यह याद रखना चाहिए कि कोई भी वस्तु हमारे जीवन से अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। जीवन में सफलताए¡, असफलताए¡ तो लगी ही रहती हैं। असफलताओं से चिन्तित होने के स्थान पर आगे बढ़ने की प्रेरणा लेनी है। अधिक दृढ़ता के साथ कार्य में जुटिए। कार्य में व्यस्त रहिए। कार्य करने में आनन्द व मस्ती की अनुभूति कीजिए तथा स्वस्थ रहिए। कहा भी गया है-व्यस्त रहो, मस्त रहो, स्वस्थ रहो। चिन्ता से निकलने का एक ही मार्ग है कि सोचने के कार्य को स्थगित कर दें, मानसिक कार्य की अपेक्षा कुछ समय के लिए शारीरिक कार्य करने लगें,एकान्त में न रहें। ह¡सी-मजाक व मनोरंजन के लिए कुछ समय निकालें। चिन्तित व्यक्ति को चाहिए कि वह हर समय व्यस्त रहे, अन्यथा निराशा में डूब जायेगा। व्यस्तता सारी चिन्ताओं को स्वयं ही समाप्त कर देगी। व्यस्तता के सामने चिन्ता ठहर ही नहीं सकती।
तुच्छ बातों से अपने खुशहाल जीवन को नष्ट मत कीजिए। हमारी अधिकांश चिन्ताए¡ निराधार व तुच्छ होती हैं। तुच्छ बातों पर ध्यान न दीजिए। जिन तुच्छ बातों से आप चिन्ताग्रस्त हैं वे इतनी महत्वपूर्ण नहीं कि आप उनके कारण चिन्तित होकर अपन कार्य से विमुख होकर निराश हो जाय¡। आप विचार करें कि आप जिन आशंकाओं से ग्रसित हैं, अगर वे घट भी जाती हैं,(वैसे इसकी संभावना भी बहुत कम है।) तो भी आपके जीवन पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा या आप अपने प्रयासों के द्वारा उनके प्रभाव को समाप्त करने की क्षमता रखते हैं। सदैव याद रखें हमारा जीवन छोटी-छोटी आशंकाओं के कारण चिंता करने के लिए नहीं है। हमें बहुत महत्वपूर्ण कार्य करने हैं। संकल्प करें मुझे चिन्तित नहीं होना है, दूसरों को भी चिन्ता रहित कर सुखी बनाना है। तुच्छ बातें दीमक के समान होती हैं,जो जीवन को नष्ट कर देतीं हैं। अत: बात का बतंगड़ नहीं बनाए¡ एवं अतीत की त्रुटियों को भूल जाय¡। इन तुच्छ व छोटी-छोटी बातों से अपने जीवन-रस को विष में न बदलें।
हम विचार करें कि जिन आशंकाओं के कारण हम भयभीत व चिंताग्रस्त हैं। वे सामान्यत: कितनी घटती हैं ? अथाZत सांिख्यकी नियमों के अनुसार उनके घटने की संभावना क्या है ? उसी श्रेणी के व्यक्तियों के आकड़ो पर विचार करें कि कितने आशंका-ग्रस्त व्यक्ति उस प्रकार की घटनाओं से पीिड़त हुए हैं। आइए अपने रिकार्ड की जा¡च कर लें। अपने मन में औसत नियम के अनुसार विचार करें, जिस धटना के कारण चिन्ता है, उसकी संभावना कहा¡ तक है? आप पायेंगे कि आपकी चिन्ताए¡ निराधार, अनावश्यक व भ्रामक हैं। आप जिन आशंकाओं से ग्रसित होकर चिन्ता का िशकार हो रहे हैं। उनकी कोई संभावना नहीं है, यदि है भी तो बहुत कम। जी हा¡, आप व्यर्थ ही चिन्ता-ग्रस्त होकर, अपने आप को हानि अवश्य पहु¡चा रहे हैं। आपको जो समय अपने काम में लगाना चाहिए था, उसे आप चिंता करने में बबाZद कर रहे हैं।
जीवन में सब कुछ हमारे अनुरूप नहीं होता। सब कुछ हमारी इच्छानुसार घटित होता तो संघषZ का आनन्द कैसे मिलता ? जीवन संघषZ का ही तो नाम है। संघषZ से ही तो हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा व शक्ति मिलती है। आग में तपकर ही सोने में चमक आती है। अत: संघषZशील बनो, किन्तु जो हो चुका है, उसे स्वीकार करके ही तुम आगे का मार्ग बना सकते हो। सामान्यत: परिस्थितिया¡ या घटनाए¡ दो प्रकार की होती हैं- मानव द्वारा नियंत्रणीय तथा अनियंत्रणीय। जिन घटनाओं को हम नियंत्रित कर सकते हैं, उन्हें नियंत्रित करके हम अपनी हानि को कम कर सकते हैं तथा जोखिमों से बच कर अपने लाभों में वृिद्ध कर सकते हैं। अनियंत्रणीय घटनाओं के बारे में हम कुछ नहीं कर सकते। उन्हें लेकर चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि जहा¡ हम कुछ कर ही नहीं सकते, वहा¡ चिन्ता करने से क्या लाभ ? बुिद्धमत्ता इसी में है कि हम, अपरिहार्य यानि होनी को स्वीकार करें। अतीत से सबक लेकर, वर्तमान को सही ढंग से जीकर भविष्य की सुदृढ़ नींव डालें। रेनहोल्ड नेबर का कथन सदैव याद रखें- ``ईश्वर से प्रार्थना करो जिसे बदला जा सकता है, उसे बदलने की शक्ति दे, और जो बदला नहीं जा सकता है, उसे स्वीकार करने की शक्ति दे।´´
चिन्ता से होने वाली हानिया¡ ऐसी हानिया¡ हैं, जिन्हें चिन्ता रहित होकर ही रोका जा सकता है। कहा जाता है कि प्रत्येक सिक्के के दो पहलू होते हैं, किन्तु चिन्ता का तो एक ही पहलू है। चिन्ता का नकारात्मक प्रभाव ही होता है, सकारात्मक नहीं। चिन्ता से हानियों का ही सामना करना पड़ता है, इससे किसी भी प्रकार का लाभ नहीं होने वाला। चिन्ता करके हम अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक जीवन के विकास को न केवल बाधित कर देते हैं, बल्कि बिल्कुल नष्ट कर देते हैं। चिन्तित रहने वाला व्यक्ति अपना मानसिक,शारीरिक,आर्थिक व सामाजिक जीवन बबाZद कर लेता है। ऐसे व्यक्ति के पास कोई भी बैठना-उठना पसन्द नहीं करता। चिन्ता करके न जाने कितने लोगों ने अपने व्यक्तिगत स्वास्थ्य को बबाZद कर लिया, परिवार के सुख-चैन को छीनकर नरक बना दिया व सामाजिक जीवन से कटकर अपने आप को न केवल अकेला बना लिया बल्कि जो योगदान सामाजिक विकास में दिया जा सकता था, उससे समाज को वंचित कर दिया और समाज ने हमको जो कुछ दिया था उसका प्रतिफल न चुकाकर हम कृतघ्न बन गए। यही नहीं अपने परिवार,समाज व शुभचिन्तकों पर हम एक बोझ बनकर रह जाते हैं। अत अभी भी समय है, स¡भलिए और चिन्ता से पैदा होने वाली क्षति पर विराम लगाइए। उसका मूल्य नििश्चत कीजिए, आप बहुत कुछ दे चुके हैं अब और अधिक मूल्य न दीजिए। अब आप जागो,चिन्ता छोड़ो-सुख से नाता जोड़ो।

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