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28 जून, 2008


ब्लॉग्स (1)
तुम ही ईश्वर तुम ही ईश्वर तुम ही भर्ता, तुम ही जग के पालनकर्ता।सर्वोच्च कर्म है कृषक तुम्हारा, तुम ही सबके संकटहर्ता।।शीत ऋतु में ठिठुर-ठिठुर कर,बिन कपड़ों के रहता तू।और निशा में जाग-जाग कर,कर्म-यज्ञ है करता तू।श्रम-सीकर हैं संपत्ति तेरी, सबका ... आगे पढ़ें...