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तुम ही ईश्वर तुम ही भर्ता, तुम ही जग के पालनकर्ता। सर्वोच्च कर्म है कृषक तुम्हारा, तुम ही सबके संकटहर्ता।।


तुम ही ईश्वर

तुम ही ईश्वर तुम ही भर्ता, तुम ही जग के पालनकर्ता।
सर्वोच्च कर्म है कृषक तुम्हारा, तुम ही सबके संकटहर्ता।।
शीत ऋतु में ठिठुर-ठिठुर कर,
बिन कपड़ों के रहता तू।
और निशा में जाग-जाग कर,
कर्म-यज्ञ है करता तू।
श्रम-सीकर हैं संपत्ति तेरी, सबका जीवन सुखमय कर्ता।
सर्वोच्च कर्म है कृषक तुम्हारा तुम ही सबके संकटहर्ता।।
ज्येष्ठ मास में तप-तप कर,
सबको अन्न खिलाता तू।
श्रम आराधन अहिर्नश कर,
कभी न सुक्ख उठाता तू।
गृहिणी तेरी विश्व मोहिनी, शब्द-सुमन में समर्पित करता।
सर्वोच्च कर्म है कृषक तुम्हारा, तुम ही सबके संकटहर्ता।।
वषाZ में नित भीग-भीग कर,
योग साधना करता तू।
स्वेद बिन्दु अपने टपकाकर,
कण-कण चन्दन करता तू।
कैसे करू¡ अभिनन्दन तेरा, निज को ही हू¡ समर्पित कर्ता।
सर्वोच्च कर्म है कृषक तुम्हारा, तुम ही सबके संकटहर्ता।।

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