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अन्दर से कुछ और है, बाहर से कुछ और। प्रेम दिखावत हैं घणा, मारेंगें बे ठौर।।


तेरे ही हित मैं पडा, सहता रहता कष्ट ।
तेरा तो अर्जन करू¡, दूजी होती नष्ट ।।
बुजुर्गोँ को साक्षर करें, यही हमारी रीत ।
कुसुमों की वय है पड़ी,क्या चिन्ता है मीत ।।
साक्षरता के नाम पर, अरबों दिये बहाय ।
प्राथमिक शिक्षा हेतु ये, आ¡सू रहे गिराय ।।
किसको िशक्षा कहते हैं, निर्णय कर दो मीत।
उच्च िशक्षित निज को कहें, रटें स्वार्थ के गीत।।
तोकू¡ धन्य विज्ञान है, कितना किया प्रकाश।
प्रेम छॉिड़ सब कुछ दिया,कृत्रिम हृदय विकास।।
छात्र िशक्षक संबंधों में, गयी गिरावट आय।
वे उसको नौकर गिनें, चूस-चूस वो खाय।।
भारत देश महान है, करते हैं गुण-गान।
कुछ इसके प्रतिकूल हो, फैलाते निज नाम।।
कटू नग्न आलोचना, याके मन को भाय।
वह विकास करता घना, जग में सफल कहाय।।
गुरुजन ही इस देश में, नौकर मानें जाय¡।
कैसै हो उसका भला ? कोई देउ बताय।।
निज गुरुतर दायित्व को, गुरु गये हैं भूल।
सबकी चाह िशक्षक बनी ,समझ रहें हैं फूल।।
बिना काम के ही यहंा,रहते हरदम व्यस्त।
कितनी महान यह धरा सूर्य न होवे अस्त।।
मृदु कुटिल मुस्कान ये, हिय को जाती भेद।
समझ न मेरे आ सकी, श्रम से आया श्वेद।।
नजर न मेरी जब पड़े, मन्द-मन्द मुस्कान।
बेचैनी हिय में मची , सिर बैठे शैतान।।
पाहन हिय हलचल करे, तब ही मानूं नेह।
मौकूं ना अब तक मिली, मिलती रहतीं देह।।
अन्दर से कुछ और है, बाहर से कुछ और।
प्रेम दिखावत हैं घणा, मारेंगें बे ठौर।।
तेरा ही चेहरा बसा , नयनो में दिन-रात।
प्लािस्टक हिय तेरा बना, करे न मुझसे बात।।
तेरे हिय को तू बता, कैसे पाउं जीत ।
मैं तुझको पाने चला, निभा रही तू रीति।।
विश्व धरा पर है विछा, परपंचो का जाल।
नेह पथ पर तू चली, स्वागत करता काल।।
चेहरे का मुरझाना, करता है बेहाल।
खुिशयों का छा जाना, मुझको लगता काल।।
कामिन को अधर ग्रिन्थ, सुर-पुर द्वार होय।
पतन मार्ग यही लागेै, यति,सन्त, साधू कोय।।
कामी निशा मंाहि लगे, अधर रस पान करें।
योगी निशा मंाहि ही, ब्रह्मानन्द सर परें।।
नत मथ मन्मथ प्रिया लगे,लखि तोहि सुघराई।
नििश-प्रिया नेकंु निहारि, क्यंू धारी निठुराई।।
चपल,चंचल,चाल चलत, चित चोरन चित चोर।
चारु चाह चकई बनी , चकवा हैं चहुं ओर।।
मयन रीझत डगर चलत, नत नयन नगराई।
रतिरानी लज्जा करत, देखि नेंकु सुघराई।।
उरज सुरख कमल जैसे,राजत मिलन्द वृन्द।
अधर सनेह खींचत हैं, और मुस्कान मन्द।।
मधुर कपोल अरुणाई ,अध-रज चाह जागी।
जूड़ा काम केतु मनौ, विश्व-विजय हठ लागी।।
बिदियंा जाकी बिजुरिया , दसन जैसे मोती ।
हरि कैं मेरे चित्त कं¡ू ,आज कहा¡ तू सोती।।
हरिणी चाल मयंक मुख, कजरारे ये नैन।
उर मेरे तू आ बसी, बोले अमृत बैन।।
गागर समाये सागर , जैसा तेरा रूप।
हिय मॉहि तू व्याप जा, लग जाये ना धूप।।
अधर लगें पंकज सुरख, स्वर्ण-बल्लरी बॉह।
उरज मनौ भटके पथिक, कैशन मॉगे छूाह।।
पुष्प ने सीखी तुझसे, मृदुल मन्द मुस्कान।
खंजर ने भी ली मा¡ग, हिय छेदन पहचान।।
कंचन भी तो हुआ ऋणी ,लिया प्रभा का अंश।
चलत अब तक केशों से , शून्य कालिमा वंश।।
हैं तड़प रहे ये पुष्प , तेरी सेजन हेतु।
स्पशZ चरण कमल कर ,मन बड़भागी हो सेतु।।
अलि तेरी ही खोज में, घूमा कह¡-कह¡ ना¡हि।
वन-वन खोजा तू मिली, मेरे ही हिय मा¡हि ।।
नहीं कहू¡ मैं शिश बदन , शिश में शोभा ना¡हि।
जो सुगन्ध चन्दन मिले, मिले न गुड़हल मॉहि।।
मृदुल क्रोध भी तेरा, मेरे मन को भाय।
उर मेरे में हैं बसे, तेरे नयन रिसाय।।
बैन या के सुधा सने, चितवन खंजर काम।
मधुर-मधुर मुस्कान ये, क्यों न जगे फिर काम।।
मृदुल मन्द मुस्कान मनहु¡, मदन मिला मन मा¡हि।
नितंबिनी नाहक नटति , नेह निछाबर ना¡हि।।


कहने में सुन्दर लगे,उर में लगे न घाव।
सत्य बात कह इस तरह,चलना पड़े न दाब।।
धारे हिय में कुटिलता, चेहरे पर मुस्कान।
बच कर नित उससे रहो,भला बने शैतान।।
इंसानो के वेश में,प्राणी बड़े विचित्र।
देखन में भोले लगें,अरि भी जैसे मित्र।।
दोराहे पर मैं खड़ा, सूझ न पड़ती राह।
तेरा साथ संभव नहीं, और कोई ना चाह।।


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