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कविता कहाँ? अब खो गई है?


कविता कहाँ? अब खो गई है?


कविता कहाँ? अब खो गई है?
बीज शान्ति के, बो गई है।।
शान्ति मृत्यु की, मानो छाया,
जीवन-विहीन ही, चलती काया।
खोया प्रेम, ईर्ष्या नहीं है,
सपने मरे, दिखती न माया।
बेचैनी कहाँ? क्यों सो गई है?
कविता कहाँ? अब खो गई है?
जीने की, अब नहीं है इच्छा,
मौत की भी, नहीं प्रतीक्षा ।
चाहते हैं, संयमी जो,
गले पड़ी आ, वह तितीक्षा।
नि:स्पन्द बुध्दि भी रो गई है।
कविता कहाँ? अब खो गई है?



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