तलाश
किससे कहू¡?
व्यथा,
अपने मन की,
कमी न है,
कूलर,कार,
िफ्रज, बंगला,
कम्प्यूटर और टेलीविजन की।
किससे कहू¡?
कि मैं
अच्छा था,
गरीब,
असभ्य,
और अनपढ़,
किससे कहू¡?
कि मेरी अमूल्य वस्तु,
विधाता की देन,
सभ्यता में आकर,
बिखर गयी है कहीं,
और मुझे उसी की है तलाश!

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