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सम्बन्धों के आवरणों में, हमको स्वार्थ ही भाता है


सम्बन्धों के आवरणों में
/संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

यहाँ नहीं है कोई किसी का, सबका सबसे नाता है।
सम्बन्धों के आवरणों में, हमको स्वार्थ ही भाता है।।
सब अपने हैं, सभी पराये,
दुश्मन को भी, मीत बनायें
अपना हित ना सधता हो तो,
मित्रों को भी दूर भगायें।
जिसके भी औजार बनो तुम, गीत तुम्हारे गाता है।
सम्बन्धों के आवरणों में, हमको स्वार्थ ही भाता है।।
पत्थर को भगवान बनायें,
मानवता को दूर भगाये
कुर्सी हमको मिलती हो तो,
मन्दिर-मस्जिद तोड़ दिखायें।
रावण का हम करें आचरण, राम नाम ही त्राता है।
सम्बन्धों के आवरणों में, हमको स्वार्थ ही भाता है।।
सबके ही सब हो जायें,
सबको अपने गले लगायें
स्वार्थ रहित हो प्रेम लुटायें
धरती अम्बर हिल-मिल गायें।
प्रेम ही है यहाँ भूख सभी की, प्रेम अश्रु छलकाता है।
सम्बन्धों के आवरणों में, हमको स्वार्थ ही भाता है।।p>


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