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  <title>राष्ट्रप्रेमी - आलेख channel</title>
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  <copyright>santosh rashtrapremi</copyright>
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  <item>
    <title>चिन्ता छोड़ो-सुख से नाता जोड़ो
</title>
    <link>http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/06/27/1214561820000.html</link>
	
			
		<description><![CDATA[
			
			
			चिन्ता छोड़ो-सुख से नाता जोड़ो                                      सभी प्राणी सुख के अभिलाषी होते हैं। मानव एक बुिद्धजीवी प्राणी है। अत: वह सुख की अभिलाषा में बड़ी-बड़ी योजनाए¡ बनाता है। विभिन्न संसाधन जुटाता है। भौतिक, सामाजिक व आध्याित्मक उन्नति के लिए ...&amp;nbsp;&lt;a href=&#034;http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/06/27/1214561820000.html&#034;&gt;और पढ़ें...&lt;/a&gt;
			
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    	<author>http://hindi.mywebdunia.com/authors/c2FudG9zaHJhc2h0cmFwcmVtaQ==/ (santosh rashtrapremi)</author>
    	
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    	<pubDate>Fri, 27 Jun 2008 10:17:00 GMT</pubDate>
  </item>
  
  <item>
    <title>खतरनाक है भ्रष्टाचार के प्रति संवेदनहीनता
</title>
    <link>http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/06/09/1213017720000.html</link>
	
			
		<description><![CDATA[
			
			
			संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी&amp;nbsp;&lt;a href=&#034;http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/06/09/1213017720000.html&#034;&gt;और पढ़ें...&lt;/a&gt;
			
		]]></description>	
		
		
		
		
		

		
	
    	
    	<author>http://hindi.mywebdunia.com/authors/c2FudG9zaHJhc2h0cmFwcmVtaQ==/ (santosh rashtrapremi)</author>
    	
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    	<pubDate>Mon, 09 Jun 2008 13:22:00 GMT</pubDate>
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  <item>
    <title>सुरसा के मुहँ की तरह बढ़ते वेतन व भत्ते  
</title>
    <link>http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/05/28/1211941020000.html</link>
	
			
		<description><![CDATA[
			
			
			सुरसा के मुहँ की तरह बढ़ते वेतन व भत्ते छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट आ गई है। पहले दिन तो लोगों की प्रतिक्रिया ठीक-ठाक ही थीं, किन्तु जैसे-जैसे उनका अर्थ समझा गया आपस में विचार-विमर्श हुआ, रिपोर्ट का विरोध किया जाने लगा। कर्मचारी-गण वेतन आयोग की रिपोर्ट से ...&amp;nbsp;&lt;a href=&#034;http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/05/28/1211941020000.html&#034;&gt;और पढ़ें...&lt;/a&gt;
			
		]]></description>	
		
		
		
		
		

		
	
    	
    	<author>http://hindi.mywebdunia.com/authors/c2FudG9zaHJhc2h0cmFwcmVtaQ==/ (santosh rashtrapremi)</author>
    	
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    	<pubDate>Wed, 28 May 2008 02:17:00 GMT</pubDate>
  </item>
  
  <item>
    <title>आतंक का मौसम आया रे!</title>
    <link>http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/05/22/1211443020000.html</link>
	
			
		<description><![CDATA[
			
			
			सवधानी की जरुरत, जीवन बचाओ है खुबसुरत&amp;nbsp;&lt;a href=&#034;http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/05/22/1211443020000.html&#034;&gt;और पढ़ें...&lt;/a&gt;
			
		]]></description>	
		
		
		
		
		

		
	
    	
    	<author>http://hindi.mywebdunia.com/authors/c2FudG9zaHJhc2h0cmFwcmVtaQ==/ (santosh rashtrapremi)</author>
    	
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    	<pubDate>Thu, 22 May 2008 07:57:00 GMT</pubDate>
  </item>
  
  <item>
    <title>चरित्र का फण्डा-कैसा है ये झण्डा?</title>
    <link>http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/05/06/1210071120000.html</link>
	
			
		<description><![CDATA[
			
			
			चरित्र का फण्डा-कैसा है ये झण्डा?  भारत देश महान है। सर्वगुणों की खान है। ये मेरा हिन्दुस्तान है। जो ये नारा लगाते हैं, वे तो कम से कम महान नहीं होते। नारे लगाने से कोई महान नहीं हो सकता। राम ने हमारे यहाँ जन्म लिया इस तथ्य से हम सभी राम तो नहीं हो जाते? ...&amp;nbsp;&lt;a href=&#034;http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/05/06/1210071120000.html&#034;&gt;और पढ़ें...&lt;/a&gt;
			
		]]></description>	
		
		
		
		
		

		
	
    	
    	<author>http://hindi.mywebdunia.com/authors/c2FudG9zaHJhc2h0cmFwcmVtaQ==/ (santosh rashtrapremi)</author>
    	
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    	<pubDate>Tue, 06 May 2008 10:52:00 GMT</pubDate>
  </item>
  
  <item>
    <title>यहाँ  वही है हंसता दिखता</title>
    <link>http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/04/30/1209509040000.html</link>
	
			
		<description><![CDATA[
			
			
			यहाँ  वही है हंसता दिखता                  स्वार्थ ही हमको नित्य रुलाता, स्वार्थ ही नित तड़फाता है। यहाँ  वही है हंसता दिखता, नित रोकर जो गाता है।। तू काँटों  को फूल समझ ले, आग को ही तू कूल समझ ले भूल हुई जो सुधर न सकती, खुशियाँ  अपनी धूल समझ ले। जो भी ...&amp;nbsp;&lt;a href=&#034;http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/04/30/1209509040000.html&#034;&gt;और पढ़ें...&lt;/a&gt;
			
		]]></description>	
		
		
		
		
		

		
	
    	
    	<author>http://hindi.mywebdunia.com/authors/c2FudG9zaHJhc2h0cmFwcmVtaQ==/ (santosh rashtrapremi)</author>
    	
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    	<pubDate>Tue, 29 Apr 2008 22:44:00 GMT</pubDate>
  </item>
  
  <item>
    <title>संतोषी सदा सुखी    </title>
    <link>http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/04/22/1208816280000.html</link>
	
			
		<description><![CDATA[
			
			
			एक मुकुन्दपुर नाम का एक गॉव था। गॉव  के पास ही एक कच्ची सड़क थी वह सड़क ही मुख्यत: वहा¡ से आने जाने का एक साधन थी। उसी गॉव  में राधा नाम की एक औरत रहती थी, बेचारी के एक बेटा था। वह दिन भर कड़ा परिश्रम करती तब जाकर खाने पीने की व्यवस्था कर पाती। खाने-पीने के ...&amp;nbsp;&lt;a href=&#034;http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/04/22/1208816280000.html&#034;&gt;और पढ़ें...&lt;/a&gt;
			
		]]></description>	
		
		
		
		
		

		
	
    	
    	<author>http://hindi.mywebdunia.com/authors/c2FudG9zaHJhc2h0cmFwcmVtaQ==/ (santosh rashtrapremi)</author>
    	
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    	<pubDate>Mon, 21 Apr 2008 22:18:00 GMT</pubDate>
  </item>
  
  <item>
    <title>नैतिकता- इक्कीसवीं सदी की 

मैं विद्यालय से वापस लौटा ही था। पहले से ही मूड़ खराब था, रास्ते में एक घटना और घट गई( जिसने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। मैं चिन्तित हो उठा, `यह क्या होता जा रहा है, नैतिकता का पतन और कहा¡ तक होगा? आजकल के युवा दूसरों का सम्मान करना तो जानते ही नहीं, अपने मा¡-बाप व िशक्षकों तक का भी नहीं, और तो और लड़किया¡ भी इस कदर बेशर्म हो जायेंगी, आज से पचास वषZ पूर्व कोई सोच भी सकता था क्या?´ मैं इसी चिन्तन में था कि मेरा मित्र भविष्यवक्ता उपदेशक आ टपका। आते ही चाय-नाश्ते के लिए ऑर्डर दिया, गोया मेरे घर में नहीं किसी होटल में पधारा हो। मेरी और एक मुस्कान फेंकी और तुरन्त ही मेरी दयनीय स्थिति को समझते हुए बोला, `` अरे! आज फिर आपके सड़े-गले सिद्धान्तों और चौंदहवी सदी की नैतिकता का खून हो गया और आप उसका मातम मना रहे हैं? ´´ वह खिलखिलाकर ह¡सता रहा। जब मुझे अधिक गम्भीर देखा तो समझाने के अन्दाज में बोला, `` हम इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ में जी रहे हैं। क्रांतिकारी परिवर्तनों की सदी- इक्कीसवीं सदी। धार्मिक, सामाजिक, पारिवारिक व नैतिक मानदण्डों को बदलने वाली इक्कीसवीं सदी। उन नवीन मानदण्डों को अपनाने व नई पीढ़ी के साथ समन्वय करने की क्षमता पैदा करो मेरे मित्र। इक्कीसवी सदी के अन्त तक कितना विकास हो चुका होगा, उसकी कल्पना करो मेरे मित्र। इक्कीसवीं सदी जिसमें बच्चे का जन्म मा¡-बाप के शारीरिक संसर्ग का परिणाम नहीं होगा। शारीरिक सम्पर्क तो चाहे जिससे आनन्द प्राप्ति के लिए किया जा सकेगा। लेकिन इस शारीरिक सम्पर्क के कारण बच्चे का जन्म, राम! राम! कैसी पिछड़ी बातें सोचते हो। इक्कीसवीं सदी में बच्चा पैदा करने से पूर्व गहन विचार मन्थन किया जायेगा। मा¡, वैज्ञानिक सिद्धान्तों, कार्य-कारण व परिणामों का विश्लेषण कर यह तय करेगी कि वह किस व्यक्ति के शुक्राणुओं पर कृपा कर उन्हें गर्भ में ठहरने की अनुमति दे। इस वैज्ञानिक सोच व वैज्ञानिक विचार मन्थन के पीछे एक वैज्ञानिक उद्देश्य होगा कि भविष्य में पैदा होने वाला जीव वैज्ञानिक लड़का हो। ठीक इसी प्रकार बाप भी विचार मन्थन, विश्लेषण व संश्लेषण के द्वारा यह तय करेगा कि वह किस महिला की कोख को पवित्र करे ताकि उच्चकोटि का वैज्ञानिक बच्चा ही उत्पन्न हो। किसी महिला के साथ आनन्द के लिए संसर्ग करना एक अलग बात है और अपने शुक्राणुओं से बच्चा पैदा करना एक अलग बात। हा¡, वैज्ञानिक बच्चा, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार वैज्ञानिक प्रबन्धन, वैज्ञानिक प्रशासन, वैज्ञानिक श्रम, वैज्ञानिक विचार, वैज्ञानिक राजनैतिक व्यवस्था व वैज्ञानिक नैतिकता, जिसे धर्म की गन्ध तक न लगी हो( ठीक उसी प्रकार धर्म, नैतिकता व सदाचरण निरपेक्ष वैज्ञानिक बच्चा। इक्कीसवीं सदी जिसमें मा¡-बाप अपने बच्चे को प्रेरणा देंगे कि वह नौकरी करने के स्थान पर किसी ख्याति-प्राप्त राजनीतिक तन्दूरी डाकू के चमचों में अपना स्थान बनाये। मा¡, अपनी बेटी के लिए मनौती मा¡गेगी कि वह किसी लाइसेन्स सुदा वैज्ञानिक वैश्यागृह में, जिसे पर्यटन व संस्कृति विभाग से मान्यता प्राप्त हो, महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करे। वह इस सड़ी-गली नैतिकता की हवा भी अपनी पुत्री को नहीं लगने देगी। वह उसको ऐसे अत्याधुनिक वैज्ञानिक स्कूल में, क्षमा करें स्कूल में नहीं, कोचिंग सेन्टर में भर्ती कराएगी जिसमें, वैज्ञानिक आकर्षण कला (artofattrection) क्या है? कामशास्त्र तो पुरातन भारतीयता का प्रतीक है सेक्स विज्ञान का अध्ययन, वैज्ञानिक, वाणििज्यक व व्यवहारिक प्रयोग, वैज्ञानिक लाभ प्राप्त करने के लिए किस प्रकार किया जा सकता है? के अध्ययन के साथ-साथ अमेरिकन मुक्त योनाचार का प्रयोग कराने के लिए उच्च-स्तर की अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला भी हो। जिसमें प्रिशक्षण दिया जाता हो कि कैसे अपने उभरे अंगो को प्रदर्शित  करके भ्रष्टाचारी नेताओं व अधिकारियों को रिझाकर उनके बिस्तर पर पहु¡चा जाता है? इक्कीसवीं सदी के अन्त में उच्च-स्तर के वैज्ञानिक विद्यालयों के विज्ञापन प्रकािशत व प्रसारित होंगे- `` अपने बच्चों के शानदार व उज्ज्वल भविष्य के लिए हमारे यहा¡ प्रवेश दिलाएं। हमारे यहा¡ अनुभवी व फर्जी  डिगि्रयों से विभूषित महान झू¡ठे, महान लुटेरे, महान बेईमान, महान सैक्स विषेशज्ञ िशक्षक नियुक्त हैं। हमारे प्राचार्य महोदय तो `राष्ट्रीय झू¡ठवक्ता´ व `भ्रष्टाचार िशरोमणि´ जैसी मानद् उपाधियों से कई बार विभूषित किए जा चुके हैं। कुछ अतिरिक्त शुल्क देकर वैज्ञानिक झू¡ठे, वैज्ञानिक लुटेरे, वैज्ञानिक बेईमान, वैज्ञानिक बलात्कारी व वैज्ञानिक सैक्सकला विशेषज्ञों की सेवाए¡ भी प्राप्त की जा सकती हैं। सभी के लिए सैक्स लैब की सुविधा नि:षुल्क है, जिसमें वैज्ञानिक ढंग व वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से, प्रिशक्षित किया जाता है कि किस प्रकार संसर्गजनित रोगों से पूर्णत: मुक्त रहते हुए, निडर होकर चाहे किसी के साथ, वैज्ञानिक ढंग से शारीरिक सम्बंध बनाकर मनोंरंजन के साथ-साथ व्यवसायिक लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है। छात्र-छात्राओं को अनुशासन के नाम पर परेशान नहीं किया जाता, उन्हें कृत्रिम प्राकृतिक वातावरण में अपनी गतिविधियों को संचालित करने के लिए पूर्णत: उन्मुक्त छोड़ दिया जाता है। ध्यान रहे हमारे यहा¡ की डिगि्रयों को अमेरिकन राष्ट्रपति सैक्स संस्थान, भारतीय भ्रष्टाचार बढ़ाओं समिति व अन्तर्राष्ट्रीय पाक आतंकवाद संस्थान द्वारा ए प्लस की मान्यता प्राप्त है।´´ उपदेशक कुछ पलों के लिए रूका, कुछ चिन्तनोपरान्त मुझे समझाने लगा। यदि तुम्हें इस शताब्दी में सफल होना है तो परम्परागत नैतिकता के लबादे को त्यागकर वैज्ञानिक नैतिकता को अपनाना होगा। पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, कर्तव्य-अकर्तव्य की अपनी अवधारणाए¡ बदलनी होंगी। अवधारणायें यू¡ ही नहीं बदलतीं, इसके लिए अपने खान-पान को बदलना होगा। तूूमने सुना ही होगा, `जैसा खाओ अन्न, वैसा बने मन्न´। यदि तुम अपनी कमाई का अशुद्ध अन्न ही खाओगे तो तुम्हारी बुिद्ध का विकास कैसे होगा। तुम्हें शर्म आनी चाहिए, खाने की चोरी को चोरी कहते हो( यह चोरी नहीं बरजोरी है, जिसमें राधा-श्याम की होरी का मजा आता है और संसार गुणगान भी गाता है। बुिद्ध का विकास तो तभी होगा, जब तुम किसी सरकारी भण्डार का माल लूटकर खाओगे। ऐसा अन्न तुम्हारे मस्तिष्क का विकास करेगा। अपने लिए नहीं तो अपने बच्चों के भविष्य के लिए ही सही, आखिर नई शताब्दी के साथ अपने आप को समायोजित करना ही पड़ेगा। नई शताब्दी ही नहीं, सहस्राब्दी भी बदल गई है और तुम हो कि चौदहवीं शताब्दी की अवधारणाओं को लिए घूम रहे हो। हमें प्रो-एिक्टव होकर एडवान्स में सब-कुछ बदलना होगा अन्यथा पाकिस्तान हमसे आगे निकल जायेगा और हम पिछड़े ही रह जायेंगे। अब तो समझना ही होगा, ईमानदार, सत्यवक्ता, समानतावादी, ध्येयनिष्ठ, महिलाओं व बुजुगोZ के लिए सम्मान की बात करने वाले पापी हैं। अपने बच्चों को इनकी छाया से भी बचाना होगा। ये सब कहना भी भयंकर गालिया¡ देने के बराबर है। आशीवार्द देना भी नए सिरे से सीखना होगा अन्यथा लोग अभिवादन करना भी बन्द कर देंगे। नई सहस्राब्दी में आशीर्वाद दिया जाना चाहिए-- अन्तर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचारी बनो, ईश्वर करे लूटमार विशेषज्ञ बनकर अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करो, सैक्स व्यापार में कुशलता प्राप्त कर अन्तर्राष्ट्रीय सप्लायर बनो, अन्तर्राष्ट्रीय पाक आतंकवाद संघ के मुखिया चुने जाओ। इन्टरनेट पर जब दो महिलाओं में झगड़ा हो जायेगा तो पहली दूसरी को गालिया¡ देगी, `तेरा बेटा ईमानदार हो जाय, तेरा बेटा वास्तविक देशभक्त हो जाय, तेरे बेटे को भ्रष्टाचार में स्नातक की उपाधि न मिले, तेरी बेटी का अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक वैश्यालय का लाइसेन्स जब्त हो जाय।´ इन सब गालियों से स्वाभाविक है कि सहनशील से सहनशील महिला भी ताव में आ जायेगी। गुस्से में लाल-पीली होकर गाली बम छोड़ेगी, ``तेरी बेटी सुधारवादी नैतिकतावादी पारम्परिक िशक्षक से शादी कर ले।´´ यह सबसे बड़ी गाली होगी क्योंकि शादी करना महिलाओं के लिए अपराध की श्रेणी में गिना जायेगा तथा ऐसी महिला को प्रगतिशील महिला मंच की सदस्यता से वंचित होना पड़ेगा। शादी करने वाली ही नहीं, उसके परिवार के लोग भी प्रगतिशीलता के विरोधी समझे जायेंगे तथा समाज से बहिष्कृत होने के हकदार होंगे। इक्कीसवी सदी के अन्त तक शादी की प्रथा समाप्त हो जायेगी। शादी, वह भी नैतिकता के रोग से ग्रस्त सुधारवादी िशक्षक से। राम! राम! इससे तो अच्छा था कि वह वैज्ञानिक ढंग से आत्महत्या ही कर लेती। बेचारी! लड़की के मा¡-बाप के पास उनके मित्र लुक-छिपकर संवेदना प्रकट करने आयेंगे। छिपकर इसलिए कि उनके पास जाने के कारण, उन्हें भी प्रगतिशीलता का विरोधी न समझ लिया जाय। पाठक कृपया भूल सुधार लें, लड़की के स्थान पर महिला पढ़ें। लड़किया¡ क्या शादी करेंगी? चालीस तक की उम्र तो सीखने-सिखाने की उम्र होती है। जब तक दो-चार बार गर्भपात न करा दिया हो तब तक तो शादी के बारे में विचार उत्पन्न होना संभव ही नहीं। उपदेशक ने आगे समझाया, िशक्षण कार्य के साथ-साथ लेखनी को भी पूर्ण विराम दे दो मित्र। अन्यथा संकट में फ¡स जाओगे। मैं कब तक और कहा¡-कहा¡ बचाऊ¡गा? सदी के अन्त तक लेखन को अपराध घोिशत कर दिया जायेगा और लेखक भगोड़ा अपराधी। लेखन कर्म अत्यन्त खतरनाक होने के कारण इसके लिए लाइसेन्स लेना अनिवार्य होगा। जिसके लिए किसी ऐसे लेखक का चमचा रहने का बीस साल का अनुभव आवश्यक होगा, जिसे अक्षर ज्ञान न हो व कलम पकड़ना न आता हो। जिसकी चोरी की रचनाए¡, न केवल स्वघोषित राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकािशत हो चुकी हों, वरन् इन्टरनेट पर जानी-मानी लेखिकाओं के साथ हमबिस्तर होने की खबरें भी प्रकािशत व प्रसारित होती रहती हों। यही नहीं कम से कम बीस सुन्दरियों को, जो अपने साथ हमबिस्तर होने के पुरुस्कार स्वरूप, कवयित्रियों के रूप में स्थापित करवा चुका हो। यही नहीं उसे परमाणुशक्ति संपन्न अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवादी संघ की केन्द्रीय समिति द्वारा मान्यता भी प्राप्त हो। 
नैतिकता- इक्कीसवीं सदी की 

नैतिकता- इक्कीसवीं सदी की</title>
    <link>http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/03/21/1206061020000.html</link>
	
			
		<description><![CDATA[
			
			
			नैतिकता- इक्कीसवीं सदी की  मैं विद्यालय से वापस लौटा ही था। पहले से ही मूड़ खराब था, रास्ते में एक घटना और घट गई( जिसने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। मैं चिन्तित हो उठा, यह क्या होता जा रहा है, नैतिकता का पतन और कहा¡ तक होगा? आजकल के युवा दूसरों का सम्मान ...&amp;nbsp;&lt;a href=&#034;http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/03/21/1206061020000.html&#034;&gt;और पढ़ें...&lt;/a&gt;
			
		]]></description>	
		
		
		
		
		

		
	
    	
    	<author>http://hindi.mywebdunia.com/authors/c2FudG9zaHJhc2h0cmFwcmVtaQ==/ (santosh rashtrapremi)</author>
    	
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    	<pubDate>Fri, 21 Mar 2008 00:57:00 GMT</pubDate>
  </item>
  
  <item>
    <title>प्रवचन </title>
    <link>http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/03/20/1206028920000.html</link>
	
			
		<description><![CDATA[
			
			
			प्रवचन                                      ये सन्त दारू पीते हैं और भी न जाने क्या-क्या करते हैं? मैं अपने छात्र/छात्राओं से कहती हू¡ कि इनकी बातों में क्या रखा है? इनसे अच्छे प्रवचन तो मैं दे लेती हू¡।´ एक शिक्षिका महोदया अपने शिक्षक साथी से ...&amp;nbsp;&lt;a href=&#034;http://rashtrapremi.mywebdunia.com/2008/03/20/1206028920000.html&#034;&gt;और पढ़ें...&lt;/a&gt;
			
		]]></description>	
		
		
		
		
		

		
	
    	
    	<author>http://hindi.mywebdunia.com/authors/c2FudG9zaHJhc2h0cmFwcmVtaQ==/ (santosh rashtrapremi)</author>
    	
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    	<pubDate>Thu, 20 Mar 2008 16:02:00 GMT</pubDate>
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